अथर्ववेद (कांड 12)
संक॑सुको॒ विक॑सुको निरृ॒थो यश्च॑ निस्व॒रः । ते ते॒ यक्ष्मं॒ सवे॑दसो दू॒राद्दू॒रम॑नीनशन् ॥ (१४)
यक्ष्मा रोग को जानने वाले जो संघात्मक, विघातक और शब्दरहित अग्ने हैं, वे यक्ष्मा के साथ ही सुदूर चले गए और वहां जा कर नष्ट हो गए. (१४)
Those who know tuberculosis, who are sanghactic, destructive and wordless, went far away with tuberculosis and were destroyed there. (14)