हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 12.2.35

कांड 12 → सूक्त 2 → मंत्र 35 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 12)

अथर्ववेद: | सूक्त: 2
द्वि॑भागध॒नमा॒दाय॒ प्र क्षि॑णा॒त्यव॑र्त्या । अ॒ग्निः पु॒त्रस्य॑ ज्ये॒ष्ठस्य॒ यः क्र॒व्यादनि॑राहितः ॥ (३५)
जो पुरुष क्रव्याद अग्नि को नहीं छोड़ता, वह अपने ज्येष्ठ पुत्र को तथा अपने धन को लेता हुआ क्षय का पात्र होता है. (३५)
The man who does not leave the agni of kravyad is entitled to decay by taking his eldest son and his wealth. (35)