हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 12.2.45

कांड 12 → सूक्त 2 → मंत्र 45 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 12)

अथर्ववेद: | सूक्त: 2
जी॒वाना॒मायुः॒ प्र ति॑र॒ त्वम॑ग्ने पितॄ॒णां लो॒कमपि॑ गच्छन्तु॒ ये मृ॒ताः । सु॑गार्हप॒त्यो वि॒तप॒न्नरा॑तिमु॒षामु॑षां॒ श्रेय॑सीं धेह्य॒स्मै ॥ (४५)
हे अग्नि! तुम जीवितों की आयु की वृद्धि करो तथा मृतकों को देवलोक में भेजो. गार्हपत्य अग्नि शत्रुओं को जलाएं. हे गार्हपत्य अग्नि! तुम मंगलमयी उषा को हम में प्रतिष्ठित करो. (४५)
O agni! Increase the life of the living and send the dead to Devlok. Burn the agni enemies. O agni! You establish mangalmayi Usha in us. (45)