हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 12.2.50

कांड 12 → सूक्त 2 → मंत्र 50 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 12)

अथर्ववेद: | सूक्त: 2
ते दे॒वेभ्य॒ आ वृ॑श्चन्ते पा॒पं जी॑वन्ति सर्व॒दा । क्र॒व्याद्यान॒ग्निर॑न्ति॒कादश्व॑ इवानु॒वप॑ते न॒डम् ॥ (५०)
जिन का पाप अश्व द्वारा घास को कुचलने के समान क्रव्याद अग्नि को कुचलता है, पाप से अपनी जीविका चलाने वाले वे पुरुष देवयान के घातक हैं. तू इस पशु धर्म पर चढ़. (५०)
Those men whose sin crushes the agni like the horse crushing the grass, those men who earn their livelihood from sin are fatal to Devayan. You ascend to this animal dharma. (50)