अथर्ववेद (कांड 12)
येश्र॒द्धा ध॑नका॒म्या क्र॒व्यादा॑ स॒मास॑ते । ते वा अ॒न्येषां॑ कु॒म्भीं प॒र्याद॑धति सर्व॒दा ॥ (५१)
जो मनुष्य धन की इच्छा से क्रव्याद अग्नि की सेवा करते हैं, वे पुरुष सदा दूसरों की रक्षा करते हैं. (५१)
Those men who serve the agni of kravyad with the desire of wealth, those men always protect others. (51)