हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 12.2.54

कांड 12 → सूक्त 2 → मंत्र 54 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 12)

अथर्ववेद: | सूक्त: 2
इ॒षीकां॒ जर॑तीमि॒ष्ट्वा ति॒ल्पिञ्जं॒ दण्ड॑नं न॒डम् । तमिन्द्र॑ इ॒ध्मं कृ॒त्वा य॒मस्या॒ग्निं नि॒राद॑धौ ॥ (५४)
पुरानी सींक, दंड, तिलों का ढेर तथा सरकंडे को इंद्र ने ईधन बनाया और उस के द्वारा यम की इस अग्नि को पृथक्‌ कर दिया. (५४)
Indra made the old sink, the penalty, the pile of sesame seeds and the sarkande fuel and separated this agni of Yama through it. (54)