हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 12.2.53

कांड 12 → सूक्त 2 → मंत्र 53 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 12)

अथर्ववेद: | सूक्त: 2
अविः॑ कृ॒ष्णा भा॑ग॒धेयं॑ पशू॒नां सीसं॑ क्र॒व्यादपि॑ च॒न्द्रं त॑ आहुः । माषाः॑ पि॒ष्टा भा॑ग॒धेयं॑ ते ह॒व्यम॑रण्या॒न्या गह्व॑रं सचस्व ॥ (५३)
हे क्रव्याद अग्नि! काली भेड़, सीसा और चंद्रमा को तेरा भाग माना जाता है तथा पिसे हुए उरद भी तेरे हव्य रूप हैं. अतः तू फिर जंगल में पहुंच जा. (५३)
O agni! Black sheep, lead and moon are considered to be part of you and crushed urad is also your divine form. So you go back to the forest. (53)