अथर्ववेद (कांड 12)
ग्राहिं॑ पा॒प्मान॒मति॒ ताँ अ॑याम॒ तमो॒ व्यस्य॒ प्र व॑दासि व॒ल्गु । वा॑नस्प॒त्य उद्य॑तो॒ मा जि॑हिंसी॒र्मा त॑ण्डु॒लं वि श॑रीर्देव॒यन्त॑म् ॥ (१८)
हे वनस्पति! तुम पाप से उत्पन्न होने वाले अंधकार को दूर करते हुए मधुर शब्द करती हो. हम अपने पापों से पार हो जाएं. यह वनस्पति मेरी हिंसा न करे और न मुझे देवमार्ग प्राप्त कराने वाले चावलों की हिंसा करे. (१८)
O plant! You utter sweet words removing the darkness emanating from sin. Let us overcome our sins. This vegetation should not do me violence, nor should it violence me with the rice that gets me the path of God. (18)