अथर्ववेद (कांड 14)
रु॒क्मप्र॑स्तरणंव॒ह्यं विश्वा॑ रू॒पाणि॒ बिभ्र॑तम् । आरो॑हत्सू॒र्या सा॑वि॒त्री बृ॑ह॒तेसौभ॑गाय॒ कम् ॥ (३०)
सूर्या सुख देने के लिए इस पलंग पर चढ़ी थी जिस पर मन को अच्छा लगने वाला बिछौना बिछा था. (३०)
Surya had climbed this bed to give happiness, on which the bed that the mind liked was laid. (30)