हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 14.2.40

कांड 14 → सूक्त 2 → मंत्र 40 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 14)

अथर्ववेद: | सूक्त: 2
आ वां॑ प्र॒जांज॑नयतु प्र॒जाप॑तिरहोरा॒त्राभ्यां॒ सम॑नक्त्वर्य॒मा । अदु॑र्मङ्गली पतिलो॒कमावि॑शे॒मं शं नो॑ भव द्वि॒पदे॒ शं चतु॑ष्पदे ॥ (४०)
प्रजापति तुम दोनों की संतान को जन्म दें. अर्यमादेव तुम दोनों को रातदिन संयुक्त करें. हे वधू! तू अमंगलों से अलग रहती हुई इस घर में प्रवेश कर और दो पैरों वाले मनुष्यों तथा चार पैरों वाले पशुओं को सुख देने वाली बन. (४०)
Prajapati, give birth to the children of both of you. Aryamadev, unite you both day and night. O bride! You enter this house separately from the evils and become the one who gives happiness to two-legged humans and four-legged animals. (40)