अथर्ववेद (कांड 14)
या मे॑प्रि॒यत॑मा त॒नूः सा मे॑ बिभाय॒ वास॑सः । तस्याग्रे॒ त्वं व॑नस्पते नी॒विंकृ॑णुष्व॒ मा व॒यं रि॑षाम ॥ (५०)
मेरा प्रिय शरीर मेरे वस्त्र में भयभीत होता है, इसलिए हे वनस्पति! पहले तुम इस की गांठ बांध दो जिस से हम दुखी न हों. (५०)
My beloved body is frightened in my robe, so O vegetation! First you tie the knot of this so that we do not be sad. (50)