अथर्ववेद (कांड 14)
ये अन्ता॒याव॑तीः॒ सिचो॒ य ओत॑वो॒ ये च॒ तन्त॑वः । वासो॒ यत्पत्नी॑भिरु॒तं तन्नः॑स्यो॒नमुप॑ स्पृशात् ॥ (५१)
इस वस्त्र में जो झालरें और किनारियां हैं, जो ताने और बाने हैं तथा जो वस्त्र स्त्रियों ने बुना है, वह हमारे शरीर का सुखपूर्वक स्पर्श करने वाला हो. (५१)
The fringes and edges in this cloth, the warp and weft and the cloth that women have woven, should touch our body happily. (51)