हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 14.2.69

कांड 14 → सूक्त 2 → मंत्र 69 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 14)

अथर्ववेद: | सूक्त: 2
अङ्गा॑दङ्गाद्व॒यम॒स्या अप॒ यक्ष्मं॒ नि द॑ध्मसि । तन्मा प्राप॑त्पृथि॒वीं मोतदे॒वान्दिवं॒ मा प्राप॑दु॒र्वन्तरि॑क्षम् । अ॒पो मा प्राप॒न्मल॑मे॒तद॑ग्नेय॒मं मा प्राप॑त्पि॒तॄंश्च॒ सर्वा॑न् ॥ (६९)
मैं इस कंघे से अपने शरीर के संहारक दोषों को दूर करता हूं. यह दोष मुझे न लगे, पृथ्वी को, आकाश को, अंतरिक्ष को, देवों को तथा जल को भी वह दोष न लगे. हे अग्नि! यह दोष पितरों तथा उन के अधिष्ठाता देव यमराज को भी न लगे. (६९)
I remove the killer defects of my body with this comb. I should not feel this fault, the earth, the sky, the space, the gods and the water should not get that fault. O agni! This defect should not be felt on the ancestors and their presiding deity Yamraj. (69)