हरि ॐ
अथर्ववेद (Atharvaved)
अथर्ववेद (कांड 16)
जि॒तम॒स्माक॒मुद्भि॑न्नम॒स्माक॑म॒भ्यष्ठां॒ विश्वाः॒ पृत॑ना॒ अरा॑तीः ॥ (१)
शत्रुओं को घायल कर के लाए हुए पदार्थ तथा जीते हुए पदार्थ हमारे हैं. हम शत्रुओं की सेना पर अधिकार करें. (१)
The substances brought by injuring the enemies and the living substances are ours. Let us take control of the enemy's army. (1)
अथर्ववेद (कांड 16)
तद॒ग्निरा॑ह॒तदु॒ सोम॑ आह पू॒षा मा॑ धात्सुकृ॒तस्य॑ लो॒के ॥ (२)
अग्नि और सोम इसी बात को कह रहे हैं. पूषा देव हमें पुण्य लोक में प्रतिष्ठित करें. (२)
Agni and Som are saying this. May Pusha Dev establish us in the virtuous world. (2)
अथर्ववेद (कांड 16)
अग॑न्म॒ स्वःस्वरगन्म॒ सं सूर्य॑स्य॒ ज्योति॑षागन्म ॥ (३)
हमें स्वर्ग प्राप्त है, जो लोक सूर्य की ज्योति से उत्तम बना है, हम उसे प्राप्त करें. (३)
We have heaven, which is made better by the light of the world sun, we should get it. (3)
अथर्ववेद (कांड 16)
व॑स्यो॒भूया॑य॒वसु॑मान्य॒ज्ञो वसु॑ वंसिषीय॒ वसु॑मान्भूयासं॒ वसु॒ मयि॑ धेहि ॥ (४)
मैं सत्कार पाने के योग्य हूं. मैं परमधनी बनने के लिए धन पर अधिकार कर सकूं. हे देव! मेरे धन को पुष्ट करो. (४)
I deserve hospitality. I can take over money to become supreme. Oh My God! Strengthen my wealth. (4)