अथर्ववेद (कांड 18)
य॒ज्ञ ए॑ति॒वित॑तः॒ कल्प॑मान ईजा॒नम॒भि लो॒कं स्व॒र्गम् । तम॒ग्नयः॒ सर्व॑हुतं जुषन्तांप्राजाप॒त्यं मेध्यं॑ जा॒तवे॑दसः । शृ॒तं कृ॒ण्वन्त॑ इ॒हमाव॑ चिक्षिपन् ॥ (१३)
विस्तृत यज्ञ समर्थ हो कर यज्ञकर्ता को स्वर्गलोक में पहुंचाता है. सर्वस्व होम करने वाले यज्ञकर्ता को अग्नियां संतुष्ट करें. इस लोक में वे अग्नियां यजमान को पूर्ण बनाएं. अग्नियां यजमान को इस यज्ञ कार्य से विमुख न होने दें. (१३)
The elaborate yajna is able to take the yajnakar to heaven. Let the agni satisfy the yajnakar who performs everything. In this world, those agnis make the host complete. Do not let the agni host deviate from this yajna work. (13)