अथर्ववेद (कांड 18)
पु॒त्रंपौत्र॑मभित॒र्पय॑न्ती॒रापो॒ मधु॑मतीरि॒माः । स्व॒धां पि॒तृभ्यो॑ अ॒मृतं॒दुहा॑ना॒ आपो॑ दे॒वीरु॒भयां॑स्तर्पयन्तु ॥ (३९)
यह मधुर जल पुत्र, पौत्र आदि को पूर्ण तृप्त करता है, ये दिव्य पितरों के लिए स्वधा तथा अमृत का दोहन करते हुए पुत्र और पौत्र दोनों को तृप्त करें. (३९)
This sweet water completely satisfies the son, grandson etc., they should satisfy both son and grandson by exploiting swadha and nectar for divine ancestors. (39)