हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 19.18.5

कांड 19 → सूक्त 18 → मंत्र 5 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 19)

अथर्ववेद: | सूक्त: 18
सूर्यं॒ ते द्यावा॑पृथि॒वीव॑न्तमृच्छन्तु । ये मा॑ऽघा॒यव॑ प्र॒तीच्याः॑ दि॒शोऽभि॒दासा॑त् ॥ (५)
दूसरों की हिंसा करने के इच्छुक जो शत्रु हैं, वे पश्चिम दिशा से आ कर रात्रि की पूजा करने वाले मेरी हिंसा करें, वे अपने विनाश के लिए द्यावा पृथ्वी का सहयोग प्राप्त करने वाले सूर्य को प्राप्त हों. (५)
The enemies who are willing to violence others, they should come from the west and worship me at night, they should get the sun that receives the support of the earth for their destruction. (5)