हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 19)

अथर्ववेद: | सूक्त: 44
आयु॑षोऽसि प्र॒तर॑णं॒ विप्रं॑ भेष॒जमु॑च्यसे । तदा॑ञ्जन॒ त्वं श॑न्ताते॒ शमापो॒ अभ॑यं कृतम् ॥ (१)
हे आंजन! तुम सौ वर्ष की आयु देने वाले हो. तुम प्रसन्न करने वाली ओषधि कहे जाते हो, इसलिए हे आंजन! तुम सुख रूप कहे जाते हो. हे जल के लक्ष्ण आंजन! तुम और जल देवता मुझे सुख प्रदान करें तथा अभय प्रदान करें. (१)
Hey Anjan! You are going to give you a hundred years of age. You are called a pleasing medicine, so O Anjan! You are called the form of happiness. O water- May you and the water god give me happiness and protection. (1)

अथर्ववेद (कांड 19)

अथर्ववेद: | सूक्त: 44
यो ह॑रि॒मा जा॒यान्यो॑ऽङ्गभे॒दो वि॒सल्प॑कः । सर्वं॑ ते॒ यक्ष्म॒मङ्गे॑भ्यो ब॒हिर्निर्ह॒न्त्वाञ्ज॑नम् ॥ (२)
हलदी के समान पीले रंग का जो पांडु रोग कठिनता से चिकित्सा करने योग्य है, वह अंगों को भिन्न करता है और अनेक प्रकार के घाव कर देता है. यह आंजन के अंगों से सभी रोगों को बाहर निकाल कर नष्ट करे. (२)
Yellow pundu disease, which is difficult to treat like haldi, separates the organs and causes many types of wounds. It removes all diseases from the organs of the anjan and destroys them. (2)

अथर्ववेद (कांड 19)

अथर्ववेद: | सूक्त: 44
आञ्ज॑नं पृथि॒व्यां जा॒तं भ॒द्रं पु॑रुष॒जीव॑नम् । कृ॒णोत्वप्र॑मायुकं॒ रथ॑जूति॒मना॑गसम् ॥ (३)
पृथ्वी पर उत्पन्न हुआ आंजन कल्याण करने वाला तथा पुरुषों को जीवित करने वाला है. यह आंजन हमें मरण रहित, रथ के समान तीव्र गति वाला तथा पाप रहित करे. (३)
Anjan, born on earth, is welfare and brings men to life. May this anjan make us without death, fast-paced like a chariot and without sin. (3)

अथर्ववेद (कांड 19)

अथर्ववेद: | सूक्त: 44
प्राण॑ प्रा॒णं त्रा॑यस्वासो॒ अस॑वे मृड । निरृ॑ते॒ निरृ॑त्या नः॒ पाशे॑भ्यो मुञ्च ॥ (४)
हे प्राण रूप आंजन! तुम मेरे प्राण की रक्षा करो तथा अकाल में नष्ट न होने वाला बनाओ. हे प्राणरूप आंजन! तुम प्राणों को सुखी बनाओ. हे निरृति रूप आंजन! हमें निर्त्ऋति के फंदों से छुड़ाओ. (४)
O soul- You protect my life and make it not to be destroyed in famine. O soul-like anjan! Make your soul happy. O nirriti roop anjan! Get us out of the trap of nirtiti. (4)

अथर्ववेद (कांड 19)

अथर्ववेद: | सूक्त: 44
सिन्धो॒र्गर्भो॑ऽसि वि॒द्युतां॑ पुष्प॑म् । वा॑तः प्रा॒णः सूर्य॒श्चक्षु॑र्दि॒वस्पयः॑ ॥ (५)
हे आंजन! तुम सागर के गर्भ और बिजली के फूल हो. तुम वायु के प्राण, सूर्य के नेत्र और आकाश के जल हो. (५)
Hey Anjan! You are the womb of the ocean and the flower of electricity. You are the life blood of the air, the eyes of the sun and the water of the sky. (5)

अथर्ववेद (कांड 19)

अथर्ववेद: | सूक्त: 44
देवा॑ञ्जन॒ त्रैक॑कुदं॒ परि॑ मा पाहि वि॒श्वतः॑ । न त्वा॑ तर॒न्त्योष॑धयो॒ बाह्याः॑ पर्व॒तीया॑ उ॒त ॥ (६)
हे त्रिककुद पर्वत पर उत्पन्न एवं देवों के द्वारा अपनी रक्षा के लिए धारण किए जाते हुए आंजन! सभी ओर से हमारी रक्षा करो. पर्वत से अधिक ऊंचे स्थान पर उत्पन्न ओषधियां अर्थात्‌ जड़ीबूटियां तुम्हारे प्रभाव को नहीं लांघ सकतीं. (६)
O Anjan, born on Mount Trikakud and worn by the gods to protect themselves! Protect us from all sides. Medicines produced at a higher place than the mountain, that is, herbs, cannot cross your influence. (6)

अथर्ववेद (कांड 19)

अथर्ववेद: | सूक्त: 44
वी॒दं मध्य॒मवा॑सृपद्रक्षो॒हामी॑व॒चात॑नः । अमी॑वाः॒ सर्वा॑श्चा॒तय॑न्ना॒शय॑दभि॒भा इ॒तः ॥ (७)
राक्षसों का विनाश करने वाला तथा रोगों को नष्ट करने वाला यह आंजन सभी रोगों का विनाश करता हुआ तथा सभी रोगों को पराजित करता हुआ प्रसिद्ध हो. (७)
This anjan, which destroys demons and destroys diseases, is famous for destroying all diseases and defeating all diseases. (7)

अथर्ववेद (कांड 19)

अथर्ववेद: | सूक्त: 44
ब॒ह्वि॒दं रा॑जन्वरु॒णानृ॑तमाह॒ पूरु॑षः । तस्मा॑त्सहस्रवीर्य मु॒ञ्च नः॒ पर्यंह॑सः ॥ (८)
हे राजा वरुण! यह मनुष्य सवेरे से शाम तक अनेक प्रकार का असत्य भाषण करता है. इस के असत्य भाषण को क्षमा करो. हे हजारों प्रकार की शक्ति वाले आंजन! इस असत्य भाषण रूप बाण से हमें सभी ओर से छुड़ाओ. (८)
O King Varuna! This man makes many types of false speeches from morning to evening. Forgive this untrue speech. O thousands of powerful arrows! Rescue us from all sides with this untrue speech arrow. (8)
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