अथर्ववेद (कांड 19)
प्र पा॑दौ॒ न यथाय॑ति॒ प्र हस्तौ॒ न यथाशि॑षत् । यो म॑लि॒म्लुरु॒पाय॑ति॒ स संपि॑ष्टो॒ अपा॑यति । अपा॑यति॒ स्वपा॑यति॒ शुष्के॑ स्था॒णावपा॑यति ॥ (१०)
हे रात्रि! तुम मेरे शन्रु के पैरों को इस प्रकार काट दो कि वह फिर आने योग्य न रहे. तुम उस के हाथों को इस प्रकार काट दो जिस से वह मेरा आलिंगन न कर सके. जो चोर मेरे समीप आता है. उसे इस प्रकार पीस दो कि वह मुझ से दूर चला जाए. वह भलीभांति पूर्ण रूप से चला जाए. वह मेरे पास से जा कर सूखे खंभे का आश्रय प्राप्त करे. (१०)
O night! You cut off the legs of my shanru in such a way that it is not able to come again. Cut off his hands in such a way that he cannot embrace me. The thief who comes close to me. Grind him in such a way that he goes away from me. Let it go well. He should go from me and get shelter in the dry pillar. (10)