हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.12.6

कांड 20 → सूक्त 12 → मंत्र 6 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 12
ए॒वेदिन्द्रं॒ वृष॑णं॒ वज्र॑बाहुं॒ वसि॑ष्ठासो अ॒भ्यर्चन्त्य॒र्कैः । स न॑ स्तु॒तो वी॒रव॑द्धातु॒ गोम॑द्यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः ॥ (६)
वसिष्ठ कुल के ऋषि कामनाओं की वर्षा करने वाले और हाथ में वज्र धारण करने वाले इंद्र की पूजा स्तोत्रों से करते हैं. वे इंद्र हमारे स्तोत्रों के द्वारा पूजित हो कर हमें पुत्रों एवं गायों से युक्त धन प्रदान करें. हे देवो! आप भी इंद्र का अनुकरण करते हुए क्षेमों से सदा हमारी रक्षा करें. (६)
The sages of the Vasishtha clan worship Indra, who showers wishes and holds vajra in his hand, with stotras. May indra be worshiped through our stotras and give us wealth with sons and cows. O God! You should also always protect us from the curses while following Indra. (6)