हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.12.7

कांड 20 → सूक्त 12 → मंत्र 7 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 12
ऋ॑जी॒षी व॒ज्री वृ॑ष॒भस्तु॑रा॒षाट्छु॒ष्मी राजा॑ वृत्र॒हा सो॑म॒पावा॑ । यु॒क्त्वा हरि॑भ्या॒मुप॑ यासद॒र्वाङ्माध्य॑न्दिने॒ सव॑ने मत्स॒दिन्द्रः॑ ॥ (७)
सोमरस के प्रेमी, वज्रधारी, कामनाओं की वर्षा करने वाले, शत्रुओं को पराजित करने वाले, शत्रु पराभवकारी बदल से संपन्न, सभी देवों के स्वामी, वृत्र असुर का विनाश करने वाले एवं नियम से सोमरस का पान करने वाले इंद्र अपने हरि नाम के घोड़ों को रथ में जोड़ कर हमारे यज्ञ में आएं और इस माध्यांदिन यज्ञ में सोमपान कर के प्रसन्न हों. (७)
Indra, the lover of Somras, the one who showers his desires, defeats enemies, is endowed with defeating enemies, the swami of all gods, destroys the vritra asuras and drinks Somras by rules, joins the horses of his Hari name in the chariot and joins our yajna and be happy by performing sompan in the yajna on this medium day. (7)