अथर्ववेद (कांड 20)
यद॑स्या अंहु॒भेद्याः॑ कृ॒धु स्थू॒लमु॒पात॑सत् । मु॒ष्काविद॑स्या एज॒तो गो॑श॒फे श॑कु॒लावि॑व ॥ (१)
पाप का विनाश करने वाली ओषधि को क्रोध हो गया है. इस के सूखे हुए शकुल गाय के खुर के गड्ढे में भरे पानी में कांपते हैं. (१)
The medicine that destroys sin has become angry. Its dried shakul trembles in the water filled in the pit of the cow's hoof. (1)