हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 96
ती॒व्रस्या॒भिव॑यसो अ॒स्य पा॑हि सर्वर॒था वि हरी॑ इ॒ह मु॑ञ्च । इन्द्र॒ मा त्वा॒ यज॑मानासो अ॒न्ये नि री॑रम॒न्तुभ्य॑मि॒मे सु॒तासः॑ ॥ (१)
हे इंद्र! यह जो हवि रूप अन्न देने वाला यजमान है, तुम इस के रथियों की रक्षा करो. हे इंद्र! सोमरस का संस्कार किया जा चुका है, इसलिए अपने घोड़ों को छोड़ कर यहां आओ और दूसरे यजमानों के यहां गमन मत करो. (१)
O Indra! This one who is the host who gives food in the form of havi, you protect his chariots. O Indra! Someras has been cremated, so leave your horses and come here and do not go to other hosts. (1)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 96
तुभ्यं॑ सु॒तास्तुभ्य॑मु॒ सोत्वा॑स॒स्त्वां गिरः॒ श्वात्र्या॒ आ ह्व॑यन्ति । इन्द्रे॒दम॒द्य सव॑नं जुषा॒णो विश्व॑स्य वि॒द्वाँ इ॒ह पा॑हि॒ सोम॑म् ॥ (२)
हे इंद्र! इस सोमरस को तुम्हारे लिए ही छाना गया है. ये स्तुतियां तुम्हारा ही आह्वान करती हैं. तुम सब को जानने वाले हो. हमारे यज्ञ में आ कर तुम सोमरस का पान करो. (२)
O Indra! This somerasa has been filtered for you only. These praises call upon you. You all know. Come to our yajna and drink someras. (2)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 96
य उ॑श॒ता मन॑सा॒ सोम॑मस्मै सर्वहृ॒दा दे॒वका॑मः सु॒नोति॑ । न गा इन्द्र॒स्तस्य॒ परा॑ ददाति प्रश॒स्तमिच्चारु॑मस्मै कृणोति ॥ (३)
देवों की कामना करने वाला जो पुरुष सोमरस को तैयार करता है, उस के स्रोतों को इंद्र स्वीकार कर लेते हैं तथा मधुर वचनों के द्वारा उसे संतुष्ट करते हैं. (३)
Indra accepts the sources of the man who prepares Someras, who wishes for the gods, and satisfies him with sweet words. (3)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 96
अनु॑स्पष्टो भवत्ये॒षो अ॑स्य॒ यो अ॑स्मै रे॒वान्न सु॒नोति॒ सोम॑म् । निर॑र॒त्नौ म॒घवा॒ तं द॑धाति ब्रह्म॒द्विषो॑ ह॒न्त्यना॑नुदिष्टः ॥ (४)
जो पुरुष सोम का संस्कार नहीं करता, वह इंदर के प्रहार के योग्य होता है. उस ब्रह्मद्वेषी और हवि का दान न करने वाले को इंद्र नष्ट कर देते हैं. (४)
A man who does not perform the rites of Soma is worthy of inder's attack. Indra destroys that brahmantrist and those who do not donate Havi. (4)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 96
अ॑श्वा॒यन्तो॑ ग॒व्यन्तो॑ वा॒जय॑न्तो॒ हवा॑महे॒ त्वोप॑गन्त॒वा उ॑ । आ॒भूष॑न्तस्ते सुम॒तौ नवा॑यां व॒यमि॑न्द्र त्वा शु॒नं हु॑वेम ॥ (५)
हे इंद्र! अश्व, गौ और अन्न की कामना करने वाले हम तुम्हारा आश्रय पाने के लिए नवीन तथा उत्तम बुद्धि से संगत हो कर तुम्हें बुलाते हैं. (५)
O Indra! Those who desire horses, cows and food, we call upon you with new and good wisdom to seek your shelter. (5)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 96
मु॒ञ्चामि॑ त्वा ह॒विषा॒ जीव॑नाय॒ कम॑ज्ञातय॒क्ष्मादु॒त रा॑जय॒क्ष्मात् । ग्राहि॑र्ज॒ग्राह॒ यद्ये॒तदे॑नं॒ तस्या॑ इन्द्राग्नी॒ प्र मु॑मुक्तमेनम् ॥ (६)
हे रोगी पुरुष! मैं तेरे जीवन के हेतु हवि देता हुआ तुझे क्षय आदि रोगों से मुक्त करता हूं. हे इंद्र और अग्नि! यदि इस पुरुष को पिशाची ने पकड़ लिया हो तो इसे उस के पाप से छुड़ाओ. (६)
O patient man! I give you havi for your life and free you from diseases like decay etc. O Indra and Agni! If this man has been caught by Pishachi, then redeem him from his sin. (6)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 96
यदि॑ क्षि॒तायु॒र्यदि॑ वा॒ परे॑तो॒ यदि॑ मृ॒त्योर॑न्ति॒कं नीत ए॒व । तमा ह॑रामि॒ निरृ॑तेरु॒पस्था॒दस्पा॑र्शमेनं श॒तशा॑रदाय ॥ (७)
यह पुरुष दुर्गति को प्राप्त हो गया है और इस की आयु क्षीण हो गई है. यह मृत्यु के समीप पहुंच गया है, तब भी मैं इस को, निर्तऋति के अंक को खींचता हूं. मैं ने इस का स्पर्श इस हेतु किया है कि यह सौ वर्ष की आयु प्राप्त करे. (७)
This man has attained misery and his life has been reduced. It has come close to death, yet I draw it, the point of nirtiti. I have touched it so that it attains the age of a hundred years. (7)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 96
स॑हस्रा॒क्षेण॑ श॒तवी॑र्येण श॒तायु॑षा ह॒विषाहा॑र्षमेनम् । इन्द्रो॒ यथै॑नं श॒रदो॒ नया॒त्यति॒ विश्व॑स्य दुरि॒तस्य॑ पा॒रम् ॥ (८)
मैं हवि के द्वारा इस रोगी पुरुष को हजारों सूक्ष्म दृष्टियों, सैकड़ों वीर्यो तथा सौ वर्ष की आयु के लिए मृत्यु से छीन लाया हूं. इसे इंद्र पूरी आयु के लिए पाप के पार लगाएं. (८)
I have brought this patient man away from thousands of subtle visions, hundreds of semen and death for the age of a hundred years. Apply it across sin for the whole life. (8)
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