अथर्ववेद (कांड 20)
मु॒ञ्चामि॑ त्वा ह॒विषा॒ जीव॑नाय॒ कम॑ज्ञातय॒क्ष्मादु॒त रा॑जय॒क्ष्मात् । ग्राहि॑र्ज॒ग्राह॒ यद्ये॒तदे॑नं॒ तस्या॑ इन्द्राग्नी॒ प्र मु॑मुक्तमेनम् ॥ (६)
हे रोगी पुरुष! मैं तेरे जीवन के हेतु हवि देता हुआ तुझे क्षय आदि रोगों से मुक्त करता हूं. हे इंद्र और अग्नि! यदि इस पुरुष को पिशाची ने पकड़ लिया हो तो इसे उस के पाप से छुड़ाओ. (६)
O patient man! I give you havi for your life and free you from diseases like decay etc. O Indra and Agni! If this man has been caught by Pishachi, then redeem him from his sin. (6)