हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 3.31.5

कांड 3 → सूक्त 31 → मंत्र 5 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 3)

अथर्ववेद: | सूक्त: 31
त्वष्टा॑ दुहि॒त्रे व॑ह॒तुं यु॑न॒क्तीती॒दं विश्वं॒ भुव॑नं॒ वि या॑ति । व्यहं सर्वे॑ण पा॒प्मना॒ वि यक्ष्मे॑ण॒ समायु॑षा ॥ (५)
त्वष्टा ने अपनी पुत्री के विवाह में जो उपहार दिया था, उसे स्थापित करने के निमित्त धरती और आकाश जिस प्रकार पृथक्‌ हुए थे, उसी प्रकार मैं इस ब्रह्मचारी को रोग आदि दुःखों को उत्पन्न करने वाले पापों तथा क्षय रोग से पृथक कर के दीर्घ जीवन से संयुक्त करता हूं. (५)
Just as the earth and the sky were separated to establish the gifts that Tvashta had given in the marriage of her daughter, in the same way, I combine this celibate with the sins causing diseases and sorrows and tuberculosis and long life. (5)