हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 19
उ॒तो अ॒स्यब॑न्धुकृदु॒तो अ॑सि॒ नु जा॑मि॒कृत् । उ॒तो कृ॑त्या॒कृतः॑ प्र॒जां न॒डमि॒वा च्छि॑न्धि॒ वार्षि॑कम् ॥ (१)
हे अपामार्ग अथवा सहदेवी! तू शत्रुओं और विरोधियों का विनाश करने में समर्थ है. तू कृत्या का प्रयोग करने वाले के पुत्र, पौत्र आदि को वर्षा ऋतु में उत्पन्न होने वाली नड नाम की घास के समान काट कर नष्ट कर दे. (१)
O Apamarg or Sahadevi! You are capable of destroying enemies and opponents. You should cut and destroy the son, grandson, etc. of the person who uses krita like a grass called a nad that is produced in the rainy season. (1)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 19
ब्रा॑ह्म॒णेन॒ पर्यु॑क्तासि॒ कण्वे॑न नार्ष॒देन॑ । सेने॑वैषि॒ त्विषी॑मती॒ न तत्र॑ भ॒यम॑स्ति॒ यत्र॑ प्रा॒प्नोष्यो॑षधे ॥ (२)
हे सहदेवी अथवा अपामार्ग निषाद के पुत्र कर्ण नामक मंत्रद्रष्टा ब्राह्मण ने तेरा प्रयोग किया है. यजमान की रक्षा के लिए तू सेना के समान गमन करती है. तू जिस देश में प्राप्त होती है, वहां अभिचार संबंधी भय नहीं रहता. (२)
O Sahadevi or son of Apamarg Nishad, a mantradrashta Brahmin named Karna has used you. To protect the host, you travel like an army. In the country where you are found, there is no fear of innovation. (2)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 19
अग्र॑मे॒ष्योष॑धीनां॒ ज्योति॑षेवाभिदी॒पय॑न् । उ॒त त्रा॒तासि॒ पाक॒स्याथो॑ ह॒न्तासि॑ र॒क्षसः॑ ॥ (३)
हे सहदेवी अथवा अपामार्ग! तू सभी जड़ीबूटियों में उसी प्रकार श्रेष्ठ है, जिस प्रकार प्रकाश करने वालों में सूर्य! तू दुर्बल की रक्षक और उसे बाधा पहुंचाने वाले राक्षस की विनाशक है. (३)
O Sahadevi or Apamarg! You are superior among all herbs, just as the sun is superior among those who light up! You are the protector of the weak and the destroyer of the demon who obstructs it. (3)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 19
यद॒दो दे॒वा असु॑रां॒स्त्वयाग्रे॑ नि॒रकु॑र्वत । तत॒स्त्वमध्यो॑षधेऽपामा॒र्गो अ॑जायथाः ॥ (४)
हे ओषधि! प्राचीन काल में इंद्र आदि देवों ने तेरे द्वारा ही राक्षसों को पराजित किया था. इसी कारण तू ने अपामार्ग नाम प्राप्त किया था. (४)
O medicine! In ancient times, Indra etc. gods defeated demons through you. That is why you received the name Apamarg. (4)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 19
वि॑भिन्द॒ती श॒तशा॑खा विभि॒न्दन्नाम॑ ते पि॒ता । प्र॒त्यग्वि भि॑न्धि॒ त्वं तं यो अ॒स्माँ अ॑भि॒दास॑ति ॥ (५)
हे अपामार्ग! तू सैकड़ों शाखाओं वाली हो कर विभिंदती नाम प्राप्त करती है. तूझे उत्पन्न करने वाला विभिंद कहलाता है. जो शत्रु हमारा विनाश करना चाहता है, तू उस की विरोधी बन कर उस का विनाश कर. (५)
O your way! You get the name Vibhindi by having hundreds of branches. The one who produces you is called Vibhind. The enemy who wants to destroy us, be your opponent and destroy him. (5)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 19
अस॒द्भूम्याः॒ सम॑भव॒त्तद्यामे॑ति म॒हद्व्यचः॑ । तद्वै ततो॑ विधूपा॒यत्प्र॒त्यक्क॒र्तार॑मृच्छतु ॥ (६)
हे ओषधि! तेरे पास से निकल कर महान्‌ तेज जिस भूमि तक जाता है, वहां गाड़ी गई कृत्या किसी को हानि नहीं पहुंचा सकती. तू अपने स्थान से निकल कर विशेष रूप से प्रज्वलित होती हुई कृत्या के निर्माण करने वाले को पीड़ा पहुंचा. (६)
O medicine! The act of driving from you to the land where the great speed goes cannot harm anyone. You came out of your place and hurt the creator of the specially ignited act. (6)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 19
प्र॒त्यङ्हि सं॑ब॒भूवि॑थ प्रती॒चीन॑फल॒स्त्वम् । सर्वा॒न्मच्छ॒पथाँ अधि॒ वरी॑यो यावया व॒धम् ॥ (७)
हे आत्माभिमुख फल देने वाले अपामार्ग! तू शत्रु के विनाश को मुझ से दूर कर के उसी के पास भेज दे. शत्रु द्वारा मेरे प्रति किए गए हिंसा साधनों और कृत्या को तू मुझ से दूर कर. (७)
O self-facing path of fruit! You take away the destruction of the enemy from me and send it to him. Remove from me the means and acts of violence committed by the enemy against me. (7)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 19
श॒तेन॑ मा॒ परि॑ पाहि स॒हस्रे॑णा॒भि र॑क्ष मा । इन्द्र॑स्ते वीरुधां पत उ॒ग्र ओ॒ज्मान॒मा द॑धत् ॥ (८)
हे सहदेवी अथवा अपामार्ग! तू सैकड़ों और हजारों उपायों से मेरी रक्षा कर और मुझे कृत्या के दोष से छुड़ा. हे लतारूपी जड़ीबूटियों की स्वामिनी! महा तेजस्वी इंद्र तेरा तेज मुझ में स्थापित करें. (८)
O sahadevi or the way! Protect me by hundreds and thousands of measures and deliver me from the guilt of actions. O swami of herbs! May Maha Tejasvi Indra establish your brilliance in me. (8)