हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 5.13.6

कांड 5 → सूक्त 13 → मंत्र 6 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 13
अ॑सि॒तस्य॑ तैमा॒तस्य॑ ब॒भ्रोरपो॑दकस्य च । सा॑त्रासा॒हस्या॒हं म॒न्योरव॒ ज्यामि॑व॒ धन्व॑नो॒ वि मु॑ञ्चामि॒ रथाँ॑ इव ॥ (६)
गीली जगह में निवास करने वाले, श्याम एवं श्वेत वर्ण से युक्त, पानी से दूर रहने वाले और सब को पराजित करने वाले क्रोध पूर्ण सर्पो के विष को हम उसी प्रकार दूर करते हैं, जिस प्रकार धनुष की डोरी और रथों के बंधन को उतारा जाता है. (६)
We remove the poison of angry serpents who live in a wet place, with black and white color, who stay away from water and defeat everyone, in the same way as the strings of bows and chariots are lowered. (6)