हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 13
द॒दिर्हि मह्यं॒ वरु॑णो दि॒वः क॒विर्वचो॑भिरु॒ग्रैर्नि रि॑णामि ते वि॒षम् । खा॒तमखा॑तमु॒त स॒क्तम॑ग्रभ॒मिरे॑व॒ धन्व॒न्नि ज॑जास ते वि॒षम् ॥ (१)
स्वर्ग के देवता वरुण ने मुझे उपदेश दिया है. उन के वचनो के द्वारा मैं तेरे विष को दूर करता हूं. जो विष मांस के ऊपर अथवा मांस के भीतर है, उसे मैं ग्रहण करता हूं. जिस प्रकार जल रेत में गिरने पर नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार तेरा विष नष्ट हो जाए. (१)
Varuna, the god of heaven, has preached to me. Through their words I remove your poison. I take the poison that is above the flesh or inside the flesh. Just as water is destroyed when it falls into the sand, so your poison is destroyed. (1)

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 13
यत्ते॒ अपो॑दकं वि॒षं तत्त॑ ए॒तास्व॑ग्रभम् । गृ॒ह्णामि॑ ते मध्य॒ममु॑त्त॒मं रस॑मु॒ताव॒मं भि॒यसा॑ नेश॒दादु॑ ते ॥ (२)
जल को दूषित करने वाला तेरा जो विष है, उसे मैं ने भीतर ही रोक लिया है. तेरे उत्तम और मध्यम रस अर्थात्‌ विष को मैं ग्रहण करता हूं. वह रस अर्थात्‌ तेरा विष नष्ट हो जाए. (२)
I have stopped the poison that you have that pollutes the water within. I receive your best and medium juice, that is, poison. That juice means that your poison is destroyed. (2)

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 13
वृषा॑ मे॒ रवो॒ नभ॑सा॒ न त॑न्य॒तुरु॒ग्रेण॑ ते॒ वच॑सा बाध॒ आदु॑ ते । अ॒हं तम॑स्य॒ नृभि॑रग्रभं॒ रसं॒ तम॑स इव॒ ज्योति॒रुदे॑तु॒ सूर्यः॑ ॥ (३)
मेरा वचन वर्षा करने वाला तथा मेघ के समान गर्जन करता है. मैं अपने उग्र वचन से तुझ सर्प को बांधता हूं. जिस प्रकार सूर्योदय होने पर अंधकार नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार यह पुरुष विष से मुक्त हो कर जीवित हो जाए. (३)
My word roars like rain and thunders like a cloud. I bind your serpent with my fierce word. Just as darkness is destroyed at sunrise, so this man becomes free from poison and becomes alive. (3)

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 13
चक्षु॑षा ते॒ चक्षु॑र्हन्मि वि॒षेण॑ हन्मि ते वि॒षम् । अहे॑ म्रि॒यस्व॒ मा जी॑वीः प्र॒त्यग॒भ्ये॑तु त्वा वि॒षम् ॥ (४)
हे सर्प! मैं अपनी नेत्र शक्ति से तेरी नेत्र शक्ति का विनाश करता हूं तथा ऋषि के द्वारा तेरे विष को समाप्त करता हूं. तू मृत्यु को प्राप्त हो, जीवित न रहे. तेरा विष तुझ पर ही बुरा प्रभाव डाले. (४)
O serpent! I destroy your eye power with my eye power and eliminate your poison through the sage. You attain death, don't live. May your poison have a bad effect on you. (4)

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 13
कैरा॑त॒ पृश्न॒ उप॑तृण्य॒ बभ्र॒ आ मे॑ शृणु॒तासि॑ता॒ अली॑काः । मा मे॒ सख्युः॑ स्ता॒मान॒मपि॑ ष्ठाताश्रा॒वय॑न्तो॒ नि वि॒षे र॑मध्वम् ॥ (५)
हे सर्पो! तुम जंगल में घूमने वाले, काले धब्बों से युक्त, घास में रहने वाले, भूरे वर्ण वाले, काले वर्ण वाले तथा निंदनीय हो. तुम हमारे कथन को सुनो. तुम हमारे सखा के घर के समीप निवास मत करो. हमारा यह कथन तुम दूसरे सर्पो को भी सुना दो. (५)
O Serpento! You roam in the forest, with black spots, live in grass, brown, black and malleable. You listen to our statement. Don't live near our friend's house. You should also tell this statement to other serpents. (5)

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 13
अ॑सि॒तस्य॑ तैमा॒तस्य॑ ब॒भ्रोरपो॑दकस्य च । सा॑त्रासा॒हस्या॒हं म॒न्योरव॒ ज्यामि॑व॒ धन्व॑नो॒ वि मु॑ञ्चामि॒ रथाँ॑ इव ॥ (६)
गीली जगह में निवास करने वाले, श्याम एवं श्वेत वर्ण से युक्त, पानी से दूर रहने वाले और सब को पराजित करने वाले क्रोध पूर्ण सर्पो के विष को हम उसी प्रकार दूर करते हैं, जिस प्रकार धनुष की डोरी और रथों के बंधन को उतारा जाता है. (६)
We remove the poison of angry serpents who live in a wet place, with black and white color, who stay away from water and defeat everyone, in the same way as the strings of bows and chariots are lowered. (6)

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 13
आलि॑गी च॒ विलि॑गी च पि॒ता च॑ म॒ता च॑ । वि॒द्म वः॑ स॒र्वतो॒ बन्ध्वर॑साः॒ किं क॑रिष्यथ ॥ (७)
हे सर्पो! तुम्हारे मातापिता आलिगी अर्थात्‌ चिपकने वाले और विलगी अर्थात्‌ न चिपकने वाले हैं. हम तुम्हारे सभी बंधुओं से परिचित हैं. तुम रसहीन अर्थात्‌ विष हीन हो कर क्या करोगे? (७)
O Serpento! Your parents are aligi i.e. clinger and willing i.e. non-adhesive. We are familiar with all your brothers. What will you do when you are juiceless, that is, poisonless? (7)

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 13
उ॑रु॒गूला॑या दुहि॒ता जा॒ता दा॒स्यसि॑क्न्या । प्र॒तङ्कं॑ द॒द्रुषी॑णां॒ सर्वा॑सामर॒सं वि॒षम् ॥ (८)
जो सांपिन गूलर नाम के विशाल वृक्ष से उत्पन्न हुई है, वह काली सांपिन की दासी है. जो सांपिन दांतों के माध्यम से अपना क्रोध प्रकट करती है, इस का विष हमें दुःख प्रदान करता है यह विष प्रभावहीन हो जाए. (८)
The serpentine that originated from a huge tree named Sycamore is the maid of black snakepin. The serpent which expresses its anger through teeth, its poison gives us sorrow, this poison becomes ineffective. (8)
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