अथर्ववेद (कांड 5)
ति॒स्रश्च॑ मे त्रिं॒शच्च॑ मेऽपव॒क्तार॑ ओषधे । ऋत॑जात॒ ऋता॑वरि॒ मधु॑ मे मधु॒ला क॑रः ॥ (३)
हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न होने वाली ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे तीन और तीस अर्थात् तैंतीस हों, पर तू मेरी वाणी को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (३)
O medicine produced according to the season! Those who condemn me may be three and thirty,33, but make my speech sweet, for you are sweet. (3)