अथर्ववेद (कांड 5)
द्वे च॑ मे विंश॒तिश्च॑ मेऽपव॒क्तार॑ ओषधे । ऋत॑जात॒ ऋता॑वरि॒ मधु॑ मे मधु॒ला क॑रः ॥ (२)
हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न होने वाली ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे दो और बीस अर्थात् बाईस हों, परंतु तू मेरे शब्दों को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (२)
O medicine produced according to the season! Those who condemn Me may be two and twenty-two, but make my words sweet, for you are sweet. (2)