अथर्ववेद (कांड 5)
एका॑ च मे॒ दश॑ च मेऽपव॒क्तार॑ ओषधे । ऋत॑जात॒ ऋता॑वरि॒ मधु॑ मे मधु॒ला क॑रः ॥ (१)
हे यज्ञ के निमित्त उत्पन्न ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे एक और दस अर्थात् ग्यारह हों, पर तू मेरी वाणी को मधुर बना. क्योंकि तू मधुर है. (१)
O medicine produced for the sake of yajna! Those who condemn Me may be one and ten, that is, eleven, but you make My voice sweet. Because you are sweet. (1)
अथर्ववेद (कांड 5)
द्वे च॑ मे विंश॒तिश्च॑ मेऽपव॒क्तार॑ ओषधे । ऋत॑जात॒ ऋता॑वरि॒ मधु॑ मे मधु॒ला क॑रः ॥ (२)
हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न होने वाली ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे दो और बीस अर्थात् बाईस हों, परंतु तू मेरे शब्दों को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (२)
O medicine produced according to the season! Those who condemn Me may be two and twenty-two, but make my words sweet, for you are sweet. (2)
अथर्ववेद (कांड 5)
ति॒स्रश्च॑ मे त्रिं॒शच्च॑ मेऽपव॒क्तार॑ ओषधे । ऋत॑जात॒ ऋता॑वरि॒ मधु॑ मे मधु॒ला क॑रः ॥ (३)
हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न होने वाली ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे तीन और तीस अर्थात् तैंतीस हों, पर तू मेरी वाणी को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (३)
O medicine produced according to the season! Those who condemn me may be three and thirty,33, but make my speech sweet, for you are sweet. (3)
अथर्ववेद (कांड 5)
चत॑स्रश्च मे चत्वारिं॒शच्च॑ मेऽपव॒क्तार॑ ओषधे । ऋत॑जात॒ ऋता॑वरि॒ मधु॑ मे मधु॒ला क॑रः ॥ (४)
हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न होने वाली ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे चार और चालीस अर्थात् चवालीस हों, परंतु तू मेरी वाणी को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (४)
O medicine produced according to the season! Those who condemn Me may be four and forty, that is, forty- forty, but make my voice sweet, for you are sweet. (4)
अथर्ववेद (कांड 5)
पञ्च॑ च मे पञ्चा॒शच्च॑ मेऽपव॒क्तार॑ ओषधे । ऋत॑जात॒ ऋता॑वरि॒ मधु॑ मे मधु॒ला क॑रः ॥ (५)
हे ऋतु के अनुसार ऊत्पन्न होने वाली ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे पांच और पचास अर्थात् पचपन हों, पर तू मेरी वाणी को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (५)
O medicine that arises according to the season! Those who condemn Me may be five and fifty, fifty-five, but make my voice sweet, for you are sweet. (5)
अथर्ववेद (कांड 5)
षट्च॑ मे ष॒ष्टिश्च॑ मेऽपव॒क्तार॑ ओषधे । ऋत॑जात॒ ऋता॑वरि॒ मधु॑ मे मधु॒ला क॑रः ॥ (६)
हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे छ: और साठ अर्थात् छियासठ हों, पर तू मेरी वाणी को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (६)
O medicine produced according to the season! Those who condemn me may be six and sixty-six, but make my voice sweet, for you are sweet. (6)
अथर्ववेद (कांड 5)
स॒प्त च॑ मे सप्त॒तिश्च॑ मेऽपव॒क्तार॑ ओषधे । ऋत॑जात॒ ऋता॑वरि॒ मधु॑ मे मधु॒ला क॑रः ॥ (७)
हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे सात और सत्तर अर्थात् सतहत्तर हों, पर तू मेरी वाणी को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (७)
O medicine produced according to the season! Those who condemn Me may be seven and seventy, seventy-seven, but make my voice sweet, for you are sweet. (7)
अथर्ववेद (कांड 5)
अ॒ष्ट च॑ मेऽशी॒तिश्च॑ मेऽपव॒क्तार॑ ओषधे । ऋत॑जात॒ ऋता॑वरि॒ मधु॑ मे मधु॒ला क॑रः ॥ (८)
हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न ओषधि! मेरी निंदा करने वाले आठ और अस्सी अर्थात अट्ठासी हों, पर तू मेरी वाणी को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (८)
O medicine produced according to the season! There may be eight and eighty i.e. eighty-eight who condemn me, but make my voice sweet, for you are sweet. (8)