अथर्ववेद (कांड 5)
षट्च॑ मे ष॒ष्टिश्च॑ मेऽपव॒क्तार॑ ओषधे । ऋत॑जात॒ ऋता॑वरि॒ मधु॑ मे मधु॒ला क॑रः ॥ (६)
हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे छ: और साठ अर्थात् छियासठ हों, पर तू मेरी वाणी को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (६)
O medicine produced according to the season! Those who condemn me may be six and sixty-six, but make my voice sweet, for you are sweet. (6)