अथर्ववेद (कांड 5)
आवि॑ष्टिता॒घवि॑षा पृदा॒कूरि॑व॒ चर्म॑णा । सा ब्रा॑ह्म॒णस्य॑ राजन्य तृ॒ष्टैषा गौर॑ना॒द्या ॥ (३)
ब्राह्मण की चर्म से ढकी हुई गाय केंचुली से ढकी हुई व्यानी सर्पिणी के समान है. हे राजन्! यह भक्षण करने योग्य नहीं है. (३)
A brahmin's skin-covered cow is like a vini serpent covered with earthworms. O king! It is not edible. (3)