अथर्ववेद (कांड 5)
अ॑न्त॒रेमे नभ॑सी॒ घोषो॑ अस्तु॒ पृथ॑क्ते ध्व॒नयो॑ यन्तु॒ शीभ॑म् । अ॒भि क्र॑न्द स्त॒नयो॒त्पिपा॑नः श्लोक॒कृन्मि॑त्र॒तूर्या॑य स्व॒र्धी ॥ (७)
हे दुदुंभि! धरती और आकाश के मध्य तेरी ध्वनियां अनेक रूपों में व्याप्त हों तथा शोभन प्रतीत हों. तू उच्च शब्द से समृद्ध हो तथा मित्रों में वेग व्याप्त करने के लिए उच्च स्वर से गर्जन कर. (७)
O milk! May your sounds pervade in many forms between the earth and the sky and appear to be pleasant. You should be rich in the high word and roar with a high voice to increase the velocity among the friends. (7)