हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 108
त्वं नो॑ मेधे प्रथ॒मा गोभि॒रश्वे॑भि॒रा ग॑हि । त्वं सूर्य॑स्य र॒श्मिभि॒स्त्वं नो॑ असि य॒ज्ञिया॑ ॥ (१)
हे देव और मनुष्य आदि के द्वारा उपासना की जाती हुई मेधा देवी! तुम हमें देने के लिए गाय और अश्वों के साथ आओ. तुम सूर्य की किरणों के समान अपनी व्याप्ति की सामर्थ्य के साथ हमारे समीप आओ. तुम हमारे लिए यज्ञ के योग्य हो. (१)
O Medha Devi worshipped by God and man etc. You come with cows and horses to give us. Come near to us with the power of your scope like the rays of the sun. You are worthy of yajna for us. (1)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 108
मे॒धाम॒हं प्र॑थ॒मां ब्रह्म॑ण्वतीं॒ ब्रह्म॑जूता॒मृषि॑ष्टुताम् । प्रपी॑तां ब्रह्मचा॒रिभि॑र्दे॒वाना॒मव॑से हुवे ॥ (२)
मैं वेदों से युक्त एवं देव, मनुष्य आदि के द्वारा पूजी जाती हुई मेधा देवी का आह्वान करता हूं. ब्राह्मणों के द्वारा सेवित, ऋषियों के द्वारा स्तुति की गई और ब्रह्मचारियों द्वारा सेवित मेधा देवी को मैं इंद्र आदि की रक्षा पाने के लिए बुलाता हूं. (२)
I invoke Medha Devi, full of Vedas and worshipped by Gods, Human Beings etc. I call Medha Devi, serviced by Brahmins, praised by sages and served by brahmacharis, to get the protection of Indra etc. (2)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 108
यां मे॒धामृ॒भवो॑ वि॒दुर्यां मे॒धामसु॑रा वि॒दुः । ऋष॑यो भ॒द्रां मे॒धां यां वि॒दुस्तां मय्या वे॑शयामसि ॥ (३)
ऋभु नाम के देव जिस मेधा को जानते थे, जिस मेधा को राक्षस जानते थे तथा वसिष्ठ आदि ऋषि वेद शास्त्र विषयक जिस मेधा को जानते थे, उसे हम अपने में स्थापित करते हैं. (३)
We establish in ourselves the medha that the god named Ribhu knew, the medha that the demons knew and the wisdom that Vasishtha etc. rishis knew about The Vedas. (3)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 108
यामृष॑यो भूत॒कृतो॑ मे॒धां मे॑धा॒विनो॑ वि॒दुः । तया॒ माम॒द्य मे॒धयाग्ने॑ मेधा॒विनं॑ कृणु ॥ (४)
जिस मेधा को पृथ्वी आदि तत्त्वों का निर्माण करने में समर्थ, मंत्र द्रष्टा एवं प्रसिद्ध ऋषि जानते हैं. हे अग्नि! उसी मेधा के द्वारा तुम मुझे मेधावी बनाओ. (४)
The talent that is capable of creating elements like earth, mantra seer and famous sages know. O agni! Make me meritorious through that talent. (4)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 108
मे॒धां सा॒यं मे॒धां प्रा॒तर्मे॒धां म॒ध्यन्दि॑नं॒ परि॑ । मे॒धां सूर्य॑स्य र॒श्मिभि॒र्वच॒सा वे॑शयामहे ॥ (५)
मैं प्रातःकाल, सायंकाल और मध्याह्न काल में मेधा देवी की स्तुति करता हूं. मैं सूर्य की किरणों के साथ दिन में स्तुति वचनों के द्वारा उस महानुभावा मेधा को अपने में स्थापित करता हूं. (५)
I praise Medha Devi in the morning, evening and midday hours. I establish that noble talent in me through praise words during the day with the rays of the sun. (5)