अथर्ववेद (कांड 6)
मे॒धां सा॒यं मे॒धां प्रा॒तर्मे॒धां म॒ध्यन्दि॑नं॒ परि॑ । मे॒धां सूर्य॑स्य र॒श्मिभि॒र्वच॒सा वे॑शयामहे ॥ (५)
मैं प्रातःकाल, सायंकाल और मध्याह्न काल में मेधा देवी की स्तुति करता हूं. मैं सूर्य की किरणों के साथ दिन में स्तुति वचनों के द्वारा उस महानुभावा मेधा को अपने में स्थापित करता हूं. (५)
I praise Medha Devi in the morning, evening and midday hours. I establish that noble talent in me through praise words during the day with the rays of the sun. (5)