हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 6.109.2

कांड 6 → सूक्त 109 → मंत्र 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 109
पि॑प्प॒ल्यः सम॑वदन्ताय॒तीर्जन॑ना॒दधि॑ । यं जी॒वम॒श्नवा॑महै॒ न स रि॑ष्याति॒ पूरु॑षः ॥ (२)
पिप्वलियों ने सागर मंथन के समय अपने जन्म के पश्चात आ कर आकाश में संभाषण किया कि जीवित पुरुष को हम ओषधि के रूप में व्याप्त करते हैं. वह पुरुष नष्ट न हो. (२)
The Pipvalis came after their birth at the time of ocean churning and spoke in the sky that we permeate the living man as a medicine. Don't let that man be destroyed. (2)