अथर्ववेद (कांड 6)
य॒ज्ञं यन्तं॒ मन॑सा बृ॒हन्त॑म॒न्वारो॑हामि॒ तप॑सा॒ सयो॑निः । उप॑हूता अग्ने ज॒रसः॑ प॒रस्ता॑त्तृ॒तीये॒ नाके॑ सध॒मादं॑ मदेम ॥ (४)
अनशन आदि दीक्षा नियमों के द्वारा दिव्य देह पाने का पात्र बना हुआ मैं अपने द्वारा किए गए महान यज्ञ का विचार कर के उसी में स्थित रहता हूं. हे अग्नि! तुम्हारी अनुमति पा कर मैं वृद्धावस्था से भी अधिक आयु पा कर दुःख रहित स्वर्गलोक में पुत्र, पौत्र आदि सहित हर्षित बनूं. (४)
I am situated in the great yajna performed by me, who has become the object of getting the divine body through the rules of fasting etc. O agni! With your permission, I should be older than old age and become happy with son, grandson etc. in the world of sorrow-free paradise. (4)