अथर्ववेद (कांड 6)
शु॒द्धाः पू॒ता यो॒षितो॑ य॒ज्ञिया॑ इ॒मा ब्र॒ह्मणां॒ हस्ते॑षु प्रपृ॒थक्सा॑दयामि । यत्का॑म इ॒दं अ॑भिषि॒ञ्चामि॑ वो॒ऽहमिन्द्रो॑ म॒रुत्वा॒न्त्स द॑दातु॒ तन्मे॑ ॥ (५)
शुद्ध, पवित्र और यज्ञ के योग्य उन जलों को मैं ऋत्विजू ब्राह्मणों के हाथ धोने के लिए अलग रखता हूं. हे जलो! जिस अभिलाषा से मैं तुम्हें छिड़कता हूं, मरुदगणों के सहित इंद्र मेरी वह अभिलाषा पूर्ण करें. (५)
I keep those waters pure, sacred and worthy of yajna aside for the hands of the Ritviju Brahmins to wash their hands. O burn! May Indra fulfill my desire with the desire with which I sprinkle you. (5)