अथर्ववेद (कांड 6)
येन॑ वृ॒क्षाँ अ॒भ्यभ॑वो॒ भगे॑न॒ वर्च॑सा स॒ह । तेन॑ मा भ॒गिनं॑ कृ॒ण्वप॑ द्रा॒न्त्वरा॑तयः ॥ (२)
हे ओषधि! तुम जिस सौभाग्य प्रदान करने वाले देव से तेज प्राप्त कर के समीपवर्ती वृक्षों का तिरस्कार करती हो, उसी सौभाग्य से मुझे सौभाग्यशाली बनाओ. हमारे शत्रु हम से दूर चले जाएं और बुरी गति को प्राप्त हों. (२)
O medicine! Make me fortunate with the good fortune that you get the glory of the god who gives you good fortune and despise the nearby trees. Let our enemies move away from us and attain bad speed. (2)