हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 18
ई॒र्ष्याया॒ ध्राजिं॑ प्रथ॒मां प्र॑थ॒मस्या॑ उ॒ताप॑राम् । अ॒ग्निं हृ॑द॒य्यं शोकं॒ तं ते॒ निर्वा॑पयामसि ॥ (१)
हे ईर्ष्या करने वाले पुरुष! तेरी ईरष्यापूर्ण मति यह है कि इस स्त्री को कोई देख न ले. इस मति को शांत करते हुए हम तेरे हृदय विदारक शोक एवं क्रोध को शांत करते हैं. (१)
O jealous man! Your jealous mind is that no one should see this woman. By calming this mind, we calm your heart-rending grief and anger. (1)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 18
यथा॒ भूमि॑र्मृ॒तम॑ना मृ॒तान्मृ॒तम॑नस्तरा । यथो॒त म॒म्रुषो॒ मन॑ ए॒वेर्ष्योर्मृ॒तं मनः॑ ॥ (२)
सब प्राणियों से अधिषित पृथ्वी शांत मन वाली और सब के शरीर से भी उदात्त मन वाली होती है. जिस प्रकार मृत पुरुष का मन इर्ष्या रहित होता है, उसी प्रकार स्त्री विषयक ईरष्यायुक्त पुरुष का मन भी शांत हो जाए. (२)
The earth, which is dominated by all beings, is calm-minded and sublime-minded than everyone's body. Just as the mind of the dead man is devoid of jealousy, in the same way, the mind of a man with jealousy related to the woman should also be calmed. (2)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 18
अ॒दो यत्ते॑ हृ॒दि श्रि॒तं म॑न॒स्कं प॑तयिष्णु॒कम् । तत॑स्त ई॒र्ष्यां मु॑ञ्चामि॒ निरू॒ष्माणं॒ दृते॑रिव ॥ (३)
हे ईर्ष्याग्रस्त पुरुष! लोहार जिस प्रकार भस्त्रा अर्थात्‌ धौंकनी से सांस बाहर निकालता है, वैसे ही मैं तेरे हृदय से ईर्ष्या दूर करता हूं. (३)
O jealous man! Just as a blacksmith breathes out of the bhastra i.e. bellows, I remove jealousy from your heart. (3)