अथर्ववेद (कांड 6)
अ॒दो यत्ते॑ हृ॒दि श्रि॒तं म॑न॒स्कं प॑तयिष्णु॒कम् । तत॑स्त ई॒र्ष्यां मु॑ञ्चामि॒ निरू॒ष्माणं॒ दृते॑रिव ॥ (३)
हे ईर्ष्याग्रस्त पुरुष! लोहार जिस प्रकार भस्त्रा अर्थात् धौंकनी से सांस बाहर निकालता है, वैसे ही मैं तेरे हृदय से ईर्ष्या दूर करता हूं. (३)
O jealous man! Just as a blacksmith breathes out of the bhastra i.e. bellows, I remove jealousy from your heart. (3)