अथर्ववेद (कांड 6)
कृ॒ष्णं नि॒यानं॒ हर॑यः सुप॒र्णा अ॒पो वसा॑ना॒ दिव॒मुत्प॑तन्ति । त आव॑वृत्र॒न्त्सद॑नादृ॒तस्यादिद्घृ॒तेन॑ पृथि॒वीं व्यू॑दुः ॥ (१)
कृष्ण वर्ण अंतरिक्ष को पा कर सूर्य की किरणें पृथ्वी के पदार्थो का रस ग्रहण करती हुई द्युलोक में पहुंच जाती हैं. वे सूर्य किरणें जल को सूर्य मंडल से वृष्टि के रूप में लाती हैं और बाद में धरती को जल से गीला कर देती हैं. (१)
After getting the black color space, the rays of the sun reach the deulok, taking the juice of the earth's substances. Those sun rays bring water from the solar system as rain and later wet the earth with water. (1)