अथर्ववेद (कांड 6)
पय॑स्वतीः कृणुथा॒प ओष॑धीः शि॒वा यदेज॑था मरुतो रुक्मवक्षसः । ऊर्जं॑ च॒ तत्र॑ सुम॒तिं च॑ पिन्वत॒ यत्रा॑ नरो मरुतः सि॒ञ्चथा॒ मधु॑ ॥ (२)
हे मरुद्गण! स्वर्ण से बने आभूषण वक्ष स्थल पर धारण कर के तुम जब चलते हो तो जलों को रसमय और ओषधियों को सुखकारी बनाते हो. हे नेता मरुद्गण! तुम जहां पर वर्षा का जल गिराते हो, उस देश में बल कारक अन्न और बुद्धियुक्त प्रजा का पोषण करो. (२)
O Desertion! When you walk by wearing ornaments made of gold on the chest, you make the waters juicy and the medicines pleasant. O leader, Marudgan! In the land where you drop rainwater, nurture the people with strength, food and wisdom. (2)