हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 23
स॒स्रुषी॒स्तद॒पसो॒ दिवा॒ नक्तं॑ च स॒स्रुषीः॑ । वरे॑ण्यक्रतुर॒हम॒पो दे॒वीरुप॑ ह्वये ॥ (१)
उत्तम कर्म करने वाला मैं सभी प्राणियों के जीवन का रूप प्राप्त करने वाले, जगत्‌ के रक्षक एवं सदैव बहने वाले जलों को अपने समीप बुलाता हूं. (१)
I call the one who takes the form of life of all beings, the protector of the world and the waters that always flow close to me. (1)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 23
ओता॒ आपः॑ कर्म॒ण्या॑ मु॒ञ्चन्त्वि॒तः प्रणी॑तये । स॒द्यः कृ॑ण्व॒न्त्वेत॑वे ॥ (२)
सदैव बहने वाले, लौकिक और वैदिक कर्मो के साधन जल हमें उत्तम फल शीघ्र पाने के लिए सभी पापों से बचाएं. (२)
May the water, which always flows, the means of cosmic and Vedic deeds, save us from all sins to get the best results quickly. (2)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 23
दे॒वस्य॑ सवि॒तुः स॒वे कर्म॑ कृण्वन्तु॒ मानु॑षाः । शं नो॑ भवन्त्व॒प ओष॑धीः शि॒वाः ॥ (३)
प्रकाशित होने वाले एवं सब के प्रेरक सूर्य की प्रेरणा होने पर मनुष्य लौकिक और वैदिक कर्म करे. जल हमारे लिए कल्याणकारी हों और ओषधियां हमारे पापों को शांत करें. (३)
If there is inspiration from the sun, which is to be illuminated and the inspiration of all, then man should do cosmic and Vedic deeds. May water be beneficial to us and medicines should our sins be calmed. (3)