अथर्ववेद (कांड 6)
स॒स्रुषी॒स्तद॒पसो॒ दिवा॒ नक्तं॑ च स॒स्रुषीः॑ । वरे॑ण्यक्रतुर॒हम॒पो दे॒वीरुप॑ ह्वये ॥ (१)
उत्तम कर्म करने वाला मैं सभी प्राणियों के जीवन का रूप प्राप्त करने वाले, जगत् के रक्षक एवं सदैव बहने वाले जलों को अपने समीप बुलाता हूं. (१)
I call the one who takes the form of life of all beings, the protector of the world and the waters that always flow close to me. (1)