हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 6.37.1

कांड 6 → सूक्त 37 → मंत्र 1 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 37
उप॒ प्रागा॑त्सहस्रा॒क्षो यु॒क्त्वा श॒पथो॒ रथ॑म् । श॒प्तार॑मन्वि॒च्छन्मम॒ वृक॑ इ॒वावि॑मतो गृ॒हम् ॥ (१)
हजार आंखों वाले इंद्र शाप क्रिया के कर्ता होते हुए अपने रथ में घोड़े जोड़ कर हमारे समीप आएं. जिस प्रकार भेड़ों के स्वामी के घर में भेड़िया जाता है, उसी प्रकार वह मुझे शाप देने वाले शत्रु को मारें. (१)
The thousand-eyed Indra, being the doer of the curse action, joined horses in his chariot and came near us. Just as a wolf goes into the house of the swami of sheep, so let him kill the enemy who curses me. (1)