हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 6.45.2

कांड 6 → सूक्त 45 → मंत्र 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 45
अ॑व॒शसा॑ निः॒शसा॒ यत्प॑रा॒शसो॑पारि॒म जाग्र॑तो॒ यत्स्व॒पन्तः॑ । अ॒ग्निर्विश्वा॒न्यप॑ दुष्कृ॒तान्यजु॑ष्टान्या॒रे अ॒स्मद्द॑धातु ॥ (२)
सामान्य हिंसा, अत्यधिक हिंसा तथा मुंह फेरने वालों की हिंसा के द्वारा जाग्रत अवस्था में हम जिस बुरे स्वप्न से पीड़ित होते हैं, निद्रावस्था में भी वही बुरा स्वप्न हम को पीड़ित करता है. बुरे स्वम्रों के निमित्त उन सभी अशोभन पापों को अग्नि देव हम से दूर करें. (२)
The nightmare that we suffer from in the waking state by general violence, excessive violence and the violence of those who turn away, the same nightmare in sleep also makes us suffer. May the Agni God remove all those indecent sins from us for the sake of evil self.' (2)