हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 6.48.1

कांड 6 → सूक्त 48 → मंत्र 1 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 48
श्ये॒नोऽसि॑ गाय॒त्रच्छ॑न्दा॒ अनु॒ त्वा र॑भे । स्व॒स्ति मा॒ सं व॑हा॒स्य य॒ज्ञस्यो॒दृचि॒ स्वाहा॑ ॥ (१)
हे बाज के समान शीघ्र गति वाले प्रातःसवन नामक यज्ञ! तेरे स्तोत्र में गायत्री छंद है. मैं तुझे डंडे के समान आधार रूप में ग्रहण करता हूं, इसीलिए तू इस यज्ञ की समाप्ति को मेरे पास ला. मेरा यह हवि उत्तम आहुतियों वाला हो. (१)
O yajna called Prathamasavan, which has a quick pace like a hawk! There is Gayatri verse in your stotra. I receive you as a base like a stick, so you bring the end of this yajna to me. This wish of mine is the best of sacrifices. (1)