अथर्ववेद (कांड 6)
सं॒ज्ञप॑नं वो॒ मन॒सोऽथो॑ संज्ञप॑नं हृ॒दः । अथो॒ भग॑स्य॒ यच्छ्रा॒न्तं तेन॒ संज्ञ॑पयामि वः ॥ (२)
हे सौमनस्य चाहने वाले पुरुषो! मैं ऐसा यज्ञ कर्म करता हूं, जिस से तुम्हारा मन उचित ज्ञान से पूर्ण हो. भग नाम के देव का जो श्रम से उत्पन्न तप है, उस के द्वारा मैं तुम्हें समान ज्ञान वाला बनाता हूं. (२)
O men who want harmony! I perform such a sacrificial deed, so that your mind is full of proper knowledge. Through the penance of the God named Bhaga, which is produced by labor, I make you of equal knowledge. (2)